दशरथ मांझी की कहानी जीवनी | Dashrath Manjhi Real story in Hindi



Dashrath Manjhi real story in Hindi – दोस्तों आज का पोस्ट आप सबके लिए बहुत ही ज्यादा प्रेरणादायक और मोटिवेशन देने वाला है क्यूंकि आज हम आपके साथ दशरथ मांझी की कहानी और जीवनी आप लोगों के साथ शेयर करने वाले है. दोस्तों दशरत मांझी एक ऐसे इंसान थे जिसने कभी भी हार नहीं मानी थी और वो एक जिद्दी टाइप के इंसान थे

आज के इस पोस्ट में हम आपको दशरत मांझी की पूरी real story शेयर करने वाले है जिसको पड़कर आपको याकीन ही नहीं होगा की क्या कोई व्यक्ति इतना बहादुर और जिद्दी हो सकता है. अगर आप लोगों ने दशरत मांझी the mountain man फिल्म नहीं देखि है तो ये पोस्ट आपके लिए है क्यूंकि आज हम आपको दशरत मांझी की पूरी जीवनी और कहानी शेयर करेंगे इस पोस्ट में

लेकिन हम आपको कहेंगे की आप मांझी the mountain man फिल्म जरुर देखो आपको बहुत ही ज्यादा motivation और प्रेरणा मिलेगी. तो चलिए दोस्तों ज्यादा टाइम बर्बाद ना करते हुए हम आज की इस रोमांचक पोस्ट की शुरुवात करते है क्यूंकि हमको ये पोस्ट लिखने का बहुत ही समाये से इंतज़ार था और जब हमको दशरत मांझी के बारे में पूरी जानकारी मिल गयी तब आज हम आपके साथ इस पोस्ट को शेयर कर रहे है

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हम आपसे ये रिक्वेस्ट करेंगे की इस पोस्ट को आप पुरे अंत थक पढना और हमको पूरा विश्वास है की आप दशरत मांझी की real story पढ़कर बहुत ही ज्यादा जोश में आजाओगे और आपके मन से नामुमकिन और मुश्किल नाम का शब्द हमेशा हमेशा के लिए निकल जायेगा और आप मुश्किल से मुश्किल काम भी कर जाओगे. तो चलिए दोस्तों पड़ते है दशरत मांझी की real story और हो जाते है motivate

दशरथ मांझी की कहानी जीवनी ( Real story )

Dashrath Manjhi Real story in Hindi ( Mountain Man )

dashrath manjhi ki kahani jeevani story

जन्म: 1934, गहलौर में हुआ था
मृत्यु: 17 अगस्त 2007, नई दिल्ली
पति/पत्नी: फाल्गुनी देवी (विवा. ?–1959)
मौत की वजह: कर्कट रोग
बच्‍चे: भगीरथ मांझी

दशरथ मांझी जी का जन्म गहलौर गाँव गया बिहार में हुआ था उनको वह पर सभ लोग mountain man के नाम से जानते थे जिन्होंने ११० मीटर लम्बी और ९.१ मीटर चौड़ी और ७.६ मीटर गहरी पहाड़ को चिर कर रख दिया था.

और यह काम करने के लिए उन्होंने कोई भी बड़ी मशीन या पत्थर तोड़ने वाली मशीन का उपयोग नहीं किया था उन्होंने केवल अपने एक चीनी और हथौड़े की मदद से इतने बड़े पहाड़ को चकनाचूर कर के रख दिया जिसकी वजह से उनका नाम पूरे गांव में तो क्या पूरे विश्व में हो चुका है था

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि दशरथ मांझी जी को पहाड़ तोड़ने की क्या जरूरत पड़ गई थी तो चलिए हम आपको बताते हैं कि उनका यह पहाड़ तोड़ने का निर्णय उन्होंने क्यों दिया

दशरथ मांझी जी पेशे से मजदूर थे और वह मजदूरी करने के लिए अपने घर से काफी दूर जाया करते थे जहां पर वह मजदूरी करते थे वहां तक पहुंचने के लिए उनको बहुत बड़ा पहाड़ को पार करके जाना पड़ता था

जब वह मजदूरी करते थे तब उनकी बीवी फाल्गुनी देवी उनके लिए हर रोज खाना और पानी लेकर आती थी क्योंकि वहां पर पानी की बहुत बड़ी समस्या होती थी

यह दिन कुछ ऐसा ही हुआ जब दशरथ मांझी जी मजदूरी कर रहे थे उस समय पर उनकी बीवी उनके लिए पानी लेकर उनके पास आ रही थी और वहां पर पहुंचने के लिए उनको एक विशाल पहाड़ को पार करके जाना पड़ता था

जब वह दशरथ मांझी जी को पानी देने के लिए जा रही थी तो पहाड़ पर चढ़ते समय उनका पैर फिसल गया और वह पहाड़ से लुढ़कते हुए जमीन पर आकर गिर गई जिसकी वजह से उनको बहुत ज्यादा चोट आई और उनका खून भी बहुत बहने लगा

उसके बाद किसी ने दशरथ मांझी जी क्योंकि मजदूरी कर रहे थे अपनी पत्नी का इंतजार कर रहे थे कि कब वह खाना और पानी लेकर मेरे लिए आएगी बाकी सब मजदूरों की बीवी उनके लिए पानी और खाना लेकर पहुंच गई थी दशरथ मांझी जी अपनी पत्नी का इंतजार कर रहे थे

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बहुत समय बीत गया उनकी पत्नी वहां तक नहीं पहुंची तब उनको चिंता फिक्र होने लगी शायद उनको लगा की कहीं कुछ काम पड़ गया होगा तब उनको देरी हो गई है आने में

उसके बाद किसी गांव वाले ने दशरथ मोदी जी तक यह भयानक खबर पहुंचाई कि उनकी पत्नी का पैर फिसल गया है पहाड़ में चढ़ते समय और वह नीचे गिर गई है और उनको बहुत ज्यादा चोट लगी है और उनके शरीर से खून भी बह रहा है

यह बात सुनकर दशरथ मांझी को झटका लग गया और वह तुरंत ही अपनी पत्नी को देखने के लिए दौड़ पड़े उसके बाद जब उन्होंने वहां का दृश्य देखा तो उनके पैरों से जमीन जैसे फट गई

उन्होंने देखा कि उनकी बीवी फाल्गुनी देवी पहाड़ के नीचे गिरी हुई है और उसको बहुत भारी मात्रा में चोट लगी है और उसके शरीर में बहुत ज्यादा खून बह रहा है

तब दशरथ मांझी जी अपने कुछ दोस्तों की मदद से अपनी पत्नी को अस्पताल ले जाने लग गए क्योंकि गांव में दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं था और उनके गांव से अस्पताल जाने तक का सफर बहुत बड़ा था

लेकिन जैसे-तैसे दशरथ मांझी जी ने हिम्मत करते हुए अपनी पत्नी को अस्पताल में पहुंचा दिया उसके बाद डॉक्टर उनकी पत्नी की देख-रेख करने लगे

लेकिन उसके बाद जो दशरथ मांझी के कानों में खबर गूंजने वाली थी वह उनकी पूरी जिंदगी को हिला कर रख देने वाली थी

थोड़े समय बाद डॉक्टर बाहर आते हैं और दशरथ मांझी को एक ऐसी खबर सुनाते हैं जिसको सुनकर उनका दिमाग काम करना बंद कर देता है

डॉक्टर उनसे कहते हैं कि उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी अब इस दुनिया में नहीं रही यह बात सुनकर दशरथ मांझी जी के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह बिल्कुल सदमे में पहुंच गए उनको कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं

जिस समय पर उनकी बीवी की मौत हुई थी उस समय पर उनकी आयु केवल 25 वर्ष थी क्योंकि बिहार में आप लोगों को तो पता ही होगा कि बहुत कम उम्र में लड़का लड़की की शादी कर दी जाती है

यह बात सुनकर दशरथ मांझी जी कि दिल में ऐसा सुराग हो गया कि वह जिंदगी भर उनकी याद में जीते रहे लेकिन एक दिन उनके दिमाग में इतना गुस्सा आ गया कि वह अपने घर से चीनी और हथोडा लेकर कुछ पहाड़ के सामने चले गए जिस बाहर से उनकी पत्नी का पैर फिसल कर मौत हो गई थी

दशरथ मांझी ने पहाड़ को बहुत ललकारा और कहा कि तेरी ऊंचाई को तो मैं तहस-नहस कर के रख दूंगा और तुझको गिरा के रख दूंगा

उस दिन से दशरथ मांझी जी ने कसम खा ली कि जब तक इस पहाड़ को मैं छोड़ूंगा नहीं तब तक मैं हिम्मत नहीं आऊंगा और यह काम पूरा करने में उन्होंने अपने दिन रात एक कर दी

ना वह दिन देते थे ना वह रात लिखते थे उनके दिमाग में तो केवल एक ही जुनून छाया हुआ था कि कैसे मैं इस पहाड़ को तोड़ दूं और वह हर सुबह उठकर अपने पहाड़ तोड़ने के लक्ष्य में लग जाते थे

जब वह पहाड़ तोड़ने का काम कर रहे होते थे तब गांव के लोग उनको पागल कहा करते हैं सनकी कहा करते थे यहां तक कि उसके घर वाले भी उनका बहुत ज्यादा विरोध करते थे कि अब जो होना था वह तो हो गया अब यह पहाड़ तोड़ कर तुझको क्या मिलेगा क्या तेरी बीवी वापस तुझको मिल जाएगी

लेकिन दशरथ मांझी की सोच ऐसे लोगों की सोच से बहुत ज्यादा बड़ी थी उनके दिमाग में यह था कि इस पहाड़ की वजह से मेरी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई है मेरी पत्नी की मौत हो गई है और मैं यह नहीं चाहता कि गांव वालों के साथ या किसी भी के साथ ऐसी दुर्घटना हो

उनके दिमाग में एक बात आई कि अगर मैं इस पहाड़ को पीटते कार्ड हूं और वहां से मैं रास्ता बनाने में कामयाब हो जाऊं तो शायद मैं जैसे कि मेरी पत्नी की मौत हो गई है पहाड़ को क्रॉस करने में वैसे कभी किसी और के साथ ना हो

दोस्तों दशरथ मांझी जी की इतनी बड़ी सोच और आप एक बार उनके अंदाजा लगा सकते हैं कि आजकल के जमाने में कौन दूसरे के लिए सोचता है लेकिन दशरथ मांझी शायद भगवान का दूसरा रूप थे कि वह अपने गांव के लोगों का भला चाहते थे लेकिन गांव के लोग उनको पागल और सनकी कहा करते थे

लेकिन दशरथ मांझी उनके बातों को बिल्कुल भी अपने दिलो दिमाग में हावी होने नहीं देते थे उनके मन में केवल एक ही लक्ष्य था कि वह कैसे इस पहाड़ को तोड़ कर बीच से एक रास्ता बना दें ताकि गांव वालों को आसानी हो जाए

यदि हम थोड़ा सा महसूस करेगी दशरथ मांझी जी ने कितनी परिश्रम किया होगा धूप हो या बरसात हो या ठंड हो उनको इस बात की कोई भी फिक्र चिंता नहीं होती थी भूखे प्यासे वह केवल अपनी पत्नी का बदला लेने के लिए पहाड़ को तोड़ना चाहते थे और पूरे गांव वालों का भला करना चाहते थे

और दोस्तों एक कहावत तो आप लोगों ने सुनी होगी कि इंसान चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता इंसान सब कुछ कर सकता है अगर उसने अपने मन में ठान लिया है कि मैं यह काम करके दिखाऊंगा

आखिरकार इतने लंबे समय के बाद दशरथ मांझी जी को पहाड़ तोड़ने में पूरे 22 साल लग गए दोस्तों क्या आप थोड़ा सा भी अंदाजा लगा सकते हो 22 साल का वक्त इतना ज्यादा होता है हम यदि 1 साल का स्ट्रगल करते हैं तो हम सोचते हैं कि हमने बहुत बड़ा स्ट्रगल कर लिया लेकिन यदि आप दशरथ मांझी जी की स्ट्रगल देखोगे उनकी 22 साल की मेहनत थी जबकि उनको यह बात पता था कि मैं पहाड़ तोड़ भी लूंगा तो उसके बाद मुझको ₹1 भी नहीं मिलेगा

दोस्तों दशरथ मांझी जी की इस कारनामे से हमको दुनिया की सबसे बड़ी चीज मिल जाती है कि हम को कभी हार नहीं मानना चाहिए और हम को अपने काम पर विश्वास होना चाहिए कि हम अगर सोचते हैं कि मैं यह काम कर सकता हूं तो आप बेशक कर सकते हैं

जब दशरथ मांझी जी ने 22 साल के परिश्रम के बाद इस पहाड़ को तोड़ दिया और वहां पर रास्ता बनाने में कामयाब हो गए तब पूरे गांव वाले उनको बहुत मान और सम्मान देने लगे

दशरथ मांझी एक ऐसा इंसान थे जो कभी हार नहीं मानते थे वह परिश्रम करने से कभी भी पीछे नहीं हटे एक बार ऐसा बात सुनने को आई थी कि वह पैदल बिहार से दिल्ली चले गए

दोस्तों और एक बात हम आपको बता दें कि जब वह पैदल दिल्ली पहुंचे तब उनकी उम्र बहुत ज्यादा थी हमारा कहने का मतलब यह है कि वह उस टाइम पर जवान नहीं थे वह बिल्कुल बूढ़े हो चुके थे तब भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और वह पैदल बिहार से दिल्ली पहुंच गए राष्ट्रपति इंदिरा गांधी से मिलने के लिए

दोस्तों हम समझते हैं कि दशरथ मांझी जी को देख कर हम सभी को यह सीख लेनी चाहिए कि काम चाहे कितना भी मुश्किल क्यों ना दिखता हो और दुनिया वाले कहेंगे आपसे कि आप यह काम नहीं कर सकते हो यह नामुमकिन है लेकिन अगर आपको अपने आप पर पूरा भरोसा है और आप कभी हार मानना नहीं चाहते हैं तो आप आसानी से नामुमकिन है नामुमकिन काम को मुमकिन बनाने में कामयाबी हासिल जरूर कर लेंगे

आपकी और दोस्तों

दोस्तों यह था दशरथ मांझी की कहानी और जीवनी ( Dashrath Manjhi real story in Hindi ) हम उम्मीद करते हैं कि आज का यह पोस्ट पढ़कर आपको बहुत ज्यादा प्रोत्साहन और मोटिवेशन मिल गया होगा. हमारा यह पोस्ट लिखने का मेन उद्देश्य यह था कि हम ऐसे सभी लोगों को यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि अगर कोई आप से कहता है कि यह काम आप नहीं कर सकते हो और यदि आपने सोच लिया है कि मुझको यह काम करना है तो वह काम आप जरूर कर सकते हो केवल आपको मेहनत करनी होगी और अपने आप पर भरोसा रखना होगा

दोस्तों यदि आपको हमारा यह पोस्ट अच्छा लगा हो तो कृपया करके इसे अपने दोस्तों के साथ घर परिवार वालों के साथ और रिश्तेदारों के साथ Facebook WhatsApp Twitter और गूगल प्लस पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें

ताकि सब लोगों को पता चलता है कि इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता है वह सब कुछ कर सकता है केवल उसको अपने आप पर विश्वास होना चाहिए और अपने काम पर पूरा भरोसा होना चाहिए और फिर चाहे इंसान इतना ही गरीब क्यों ना हो वह पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकता है अपने काम के बलबूते पर धन्यवाद दोस्तों

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