रामायण की पूरी कहानी | Full Story of Ramayan in Hindi

Full Story of Ramayan in Hindi: रामायण हिंदू धर्म का वो पवित्र ग्रंथ है, जिसमें एक आदर्श व्यक्ति के जीवन को बताया गया है। रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन को दर्शाया गया है, जो हिंदुओं के आराध्य है।

प्रत्येक हिंदू परिवार में भगवान राम का गुणगान किया जाता है। हिंदुओं में इनकी लोकप्रियता और आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि आज भी हिन्दू धर्म में कोई व्यक्ति एक-दूसरे से मिलता है तो वो जय सियाराम या जय श्रीराम कहकर मिलता है।

भगवान राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श राजा, आदर्श पिता और आदर्श मित्र थे। श्रीराम सर्वगुण सम्पन्न और दयालु स्वभाव के थे। इनके कर्म और गुण हमेशा से मानवजाती का पथप्रदर्शित कर रहे हैं। श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार थे, लेकिन वो एक साधारण मनुष्य के रूप में इस धरती पर जन्मे थे।

एक मर्यादा पुरुष होने के कारण रामायण में श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। श्रीराम एक ऐसे महान पुरुष थे, जिनके विचार आज भी मानव जाती के लिए प्रेरणा है। पुत्र धर्म, पति धर्म, पिता धर्म का पालन कैसे किया जाता है, इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ रामायण में मिलता है।

श्रीराम के शासनकाल को रामराज्य कहा जाता है। रामराज्य में पूरी प्रजा सुख से रहती थी, उन्हें अपने जीवन में कोई कष्ट नहीं था। रामराज्य में प्रत्येक व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अधिकार था और उन पर किसी का कोई दबाव नहीं था। राम नाम आज भी ऊर्जा का एक स्त्रोत है।

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी है। वाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण को आदि रामायण या वाल्मीकि रामायण कहते है। वाल्मीकि रामायण ही इस बात का प्रमाण है कि सच में इस भारतवर्ष पर कभी रामराज्य हुआ करता था।

इसके बाद सनातन धर्म में जन्में तुलसीदास जी ने रामायण की रचना की। तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण का नाम “श्रीरामचरितमानस” है। आधुनिक रामायण जो हम देखते या पढ़ते है वो श्रीरामचरितमानस है। इसे तुलसी रामायण भी कहा जाता है।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार राम त्रेता युग में जन्में थे। हिंदू धर्म में चार युग है, जिसमें सबसे पहले सतयुग, फिर त्रेता युग, फिर द्वापर युग और अंत में कलयुग होता है। अभी कलयुग चल रहा है। महाभारत द्वापर युग की गाथा है और इसी युग में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था।

वाल्मीकि रामायण में 6 कांड/अध्याय है, परंतु श्रीरामचरितमानस में 7 कांड है। तो आइए जानते है रामायण को हिन्दी भाषा में (Ramayan in Hindi)। रामायण की शुरुआत राजा दशरथ से होती है जो श्रीराम के पिता थे।

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रामायण की पूरी कहानी

Ramayan Full Story in Hindi

Ramayan in hindi

1.राजा दशरथ

प्राचीन समय में सरयू नदी के किनारे कौशल प्रदेश हुआ करता था। कौशल प्रदेश की राजधानी अयोध्या थी। जहां इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का शासन था। राजा दशरथ इक्ष्वाकु वंश के सम्राट “अज” के पुत्र थे और इनकी माताश्री का नाम इन्दुमति था।

अपने पिता के बाद दशरथ अयोध्या के महाराज बने। दशरथ की तीन पत्नियाँ थी, जिनके नाम कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा थे। कौशल्या, कोकल सम्राट सुकौशल की पुत्री थी। कैकेयी, कैकय नरेश अश्वपति और सुमित्रा, काशी नरेश की पुत्री थी।

विवाह के बहुत समय बाद भी जब राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति नहीं हुई तो उनके मन में अगले उत्तराधिकारी को लेकर संशय उत्पन्न होने लगा। तब उन्होंने अपने कुल गुरु ऋषि वशिष्ठ से इस बारे में सलाह की तो उन्होंने दशरथ को पुत्रेष्टि यज्ञ करने को कहा।

2. श्रीराम का जन्म

यज्ञ सम्पन्न होने के कुछ समय बाद ही दशरथ के चार पुत्र हुए। कौशल्या की कोख से राम ने, सुमित्रा की कोख से लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने और कैकेयी की कोख से भरत ने जन्म लिया। इस तरह भगवान श्रीराम और शेषनाग लक्ष्मण का इस धरा पर अवतरण हुआ।

बचपन से ही चारों बालक तेजस्वी और सुंदर थे। इनके मुख का तेज हर किसी को इनकी और आकर्षित करता था। राम राजा दशरथ के सबसे प्यारे पुत्र थे। वैसे चारों भाई आज्ञाकारी और विनम्र स्वभाव के थे।

चारों राजकुमार सुबह उठते ही सबसे पहले अपने माता-पिता और अपने से बड़ों के चरण स्पर्श करते और उनका आशीर्वाद लेते। राजा दशरथ अपने चारों पुत्रों को पाकर ईश्वर का सदैव धन्यवाद करते।

अब वक्त धीरे-धीरे बीतता जा रहा था और चारों भाई शिक्षा ग्रहण करने के लायक होते गए। एक दिन गुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ से कहा की राजन अब चारों राजकुमारों को विद्या ग्रहण करने के लिए आश्रम में जाना चाहिए। राजा दशरथ ने भी इसमें अपनी सहमति जताई।

चारों राजकुमार ऋषि वशिष्ठ के साथ जंगल में अपनी शिक्षा पाने के लिए चले गए। ऋषि वशिष्ठ ने चारों राजकुमारों को अपने तप और विद्या से अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला में निपुण किया। लक्ष्मण सदैव राम के साथ रहते और उनकी हर आज्ञा का पालन करते। भरत, शत्रुघ्न का आपस में स्नेह था।

इस तरह से चारों भाइयों ने अपनी शिक्षा ग्रहण की और युद्ध कला में निपुण हो गए। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने खुद को एक योद्धा की तरह अपने आप को ढाल लिया। अब वो किसी को भी टक्कर दे सकते थे।

3. ताड़का और अन्य राक्षसों का वध

एक बार महामुनि विश्वामित्र जी राजा दशरथ के पास आए। उन्होंने राजा दशरथ से राम को अपने साथ ले जाने की बात कही। राजा दशरथ ने जब इस बात का कारण पूछा तो उन्होंने कहा की वन में कुछ राक्षस यज्ञ और हवन में विघ्न डालते हैं। हमने ऋषि वशिष्ठ से राम की युद्ध कला के बारे में जाना तो हम आपके पास सहायता मांगने के लिए चले आए।

राजा दशरथ ने भी विश्वामित्र जी का मान रखा। उस समय राम की आयु मात्र 16 वर्ष थी। लक्ष्मण भी राम के साथ महामुनि के आश्रम जाने के लिए तैयार हो गए।

आश्रम जाते वक्त उनका सामना ताड़का नाम की राक्षसी से हुआ। ताड़का बहुत ही विशालकाय और मायावी थी। लेकिन राम ने अपने बल और विद्या से ताड़का का वध किया। राम के हाथों मृत्यु प्राप्त होने के कारण ताड़का का उद्धार हुआ।

इससे खुश होकर विश्वामित्र जी ने श्रीराम और लक्ष्मण को अनेक विद्याएँ और अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। जिनसे वो कभी भी किसी से पराजित नहीं हो सकते। अब दोनों राजकुमार पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो चुके थे। अब उनके अस्त्रों का काट किसी के भी पास नहीं था।

कुछ समय बाद वे विश्वामित्र जी के आश्रम पहुँच गए। जहां उन्होंने यज्ञ में विघ्न डालने आए मारीच और सुबाहु नामक राक्षसों का संहार किया। वीरता से लड़ते हुए कुछ ही समय में राम ने राक्षस सेना को भी परास्त कर उन्हें मृत्यु दंड दिया।

इसके बाद विश्वामित्र जी दोनों राजकुमारों को गौतम मुनि के आश्रम ले गए। वो आश्रम वीरान पड़ा था लेकिन वहाँ एक पत्थर पड़ा था जिस पर तुलसी का पौधा उगा हुआ था।

विश्वामित्र जी ने राम को आहिल्या के बारे में बताया, जो गौतम मुनि की पत्नी थी। एक भूल के कारण आहिल्या को गौतम मुनि ने श्राप देकर पत्थर बना दिया था।

राम ने जब उस पत्थर पर अपना पैर रखा तो आहिल्या अपने वास्तविक स्वरूप में आ गई। इस तरह राम ने आहिल्या उद्धार किया। अपने वास्तविक स्वरूप को पाकर आहिल्या ने रघुनाथ के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई और उनका धन्यवाद किया।

4. श्रीराम-सीता विवाह

आहिल्या उद्धार और राक्षसों के अंत के बाद विश्वामित्र जी दोनों राजकुमारों को जनकपुर ले लाते हैं। जो महाराज जनक का राज्य था। राम और लक्ष्मण दोनों जनकपुर की भव्यता देखकर अतिप्रसन्न हुए। उनका मन बार-बार जनकपुर की सुंदरता की प्रशंसा कर रहा था।

जनकपुर पहुँचने के बाद विश्वामित्र जी मिथिला नरेश “जनक” से मिले। राजा जनक ने जब दोनों राजकुमारों को देखा तो उनके ललाट के तेज से वो अत्यधिक प्रभावित हुए। विश्वामित्र जी ने उनका परिचय करवाया। अयोध्या के राजकुमार का नाम सुनते ही राजा जनक प्रसन्न हो गए।

इसके बाद दोनों राजकुमार जनकपुरी में घूमने चले गए। महल की खूबसूरती को देखते हुए दोनों भाई बगीचे में चले जाते हैं। जहां उन्होंने सीता को देखा, राम सीता को देखकर मन्नमुग्ध हो गए। सीता भी इनके तेज ललाट और सुंदर चेहरे को देखकर इनकी और आकर्षित हो गई।

उसी समय के दौरान राजा जनक ने सीता के लिए स्वयंवर रखा था। जिसमें दशों-दिशाओं के महारथी, बलशाली राजा-महाराजा और राजकुमार आए हुए थे। विश्वामित्र जी भी दोनों राजकुमारों को अपने साथ यज्ञशाला में ले आए। स्वयंवर में एक दिव्य शिवधनुष रखा हुआ था।

सीता से विवाह करने के लिए उस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना उस स्वयंवर का लक्ष्य था। एक-एक करके सभी ने प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशिश की लेकिन कोई भी कामयाब नहीं हुआ। प्रत्यंचा दूर की बात थी किसी से वो धनुष उठाया भी नहीं गया। दरबार में उपस्थित सभी राजा-महाराजाओं के चेहरे पर मायूसी छा गई।

इसके बाद विश्वामित्र जी कहने पर राम शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे आए। राम ने एक ही झटके में धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा दी। इसके बाद उन्होंने एक ही झटके में धनुष के दो भाग कर दिये। इससे इतनी ध्वनि निष्कासित हुई जो तीनों लोकों में सुनाई दी।

इसके बाद चारों भाइयों का विवाह जनकपुर में हुआ। राम का सीता, लक्ष्मण का उर्मिला, भरत का मांडवी और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से हुआ। दोनों नगर अब एक दूसरे से वैवाहिक बंधन में बंध चुके थे। इसके बाद बारात अयोध्या लौट आई जहां सभी का जोरों-शोरों से स्वागत हुआ।

5. कैकेयी के वचन

विवाह के कुछ समय बाद राजा दशरथ ने राम को अपना उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा की। यह सुनकर कि हमारे अगले महाराज “रामचन्द्र जी” होंगे, पूरी प्रजा उत्सव मनाने लगी। लेकिन मंथरा नाम की एक दासी ने रानी कैकेयी को बहकाना शुरू कर दिया।

बहकावे में आकार कैकेयी ने राजा दशरथ से वो दो वचन मांग लिए जो उन्हें देवासुर संग्राम में दशरथ ने ही दिए थे। इन दोनों वचनों में सबसे पहले कैकेयी ने राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और दूसरे वचन में भरत के लिए अयोध्या का सिंहासन मांगा।

राजा दशरथ यह सुनकर व्याकुल हो गए और उन्होंने कैकेयी से इस बारे में फिर से विचार करने को कहा। लेकिन कैकेयी ने अपना इरादा नहीं बदला। प्रजा को जब इस बात का पता चला तो पूरी अयोध्या नगरी में मायूसी छा गई।

6. 14 वर्ष का वनवास

कैकेयी के दो वचनों से अयोध्या नरेश दशरथ पूरी तरह टूट गए। राम को जब इस बारे में ज्ञात हुआ तो वे तुरंत अपने पिता के पास आए। राजा दशरथ ने राम को देखते हुए गले लगा लिया। राम ने अपने पिता से कहा की मैं आज आपके वचनों का मान रखूँगा।

आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अपने कर्तव्य को निष्ठाभाव से निभा सकूँ। “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।” इसके बाद राम अपनी माता कौशल्या से मिलने चले जाते है और उनसे वन में जाने की आज्ञा लेते है। माता कौशल्या भरे मन से राम को आज्ञा देती है।

इसके बाद राम एक-एक करके माता सुमित्रा, कैकेयी और गुरुजनों से मिले। राम ने उनसे वनवास जाने की आज्ञा मांगी। माता कैकेयी को छोड़कर सभी बहुत दुःखी थे, वो राम को वन में नहीं जाने देना चाहते थे। लेकिन राम अपने पिता के वचनों और माता की आज्ञा को कभी नहीं टाल सकते थे।

सीता और लक्ष्मण को जब इस बारे में पता चला तो वो भी राम के साथ जाने के लिए तैयार हो गए। परंतु श्रीराम ने उन्हें अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। तो माता सीता ने कहा कि हे प्राणनाथ! मेरे लिए आपसे बढ़कर कोई नहीं है। मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ। कृपया मुझे खुद से अलग मत कीजिये।

इसी तरह लक्ष्मण ने कहा कि मैं हमेशा से आपका अनन्य सेवक हूँ। मैंने खुद को कभी आपसे अलग नहीं समझा। कृपया करके आप मुझे भी अपने साथ ले चलिए। अपने छोटे भाई और पत्नी के इस अपार प्रेम से श्रीराम अति प्रसन्न हुए और तीनों निकल पड़े 14 वर्ष के वनवास के लिए।

7. दशरथ की मृत्यु और राम-भारत मिलाप

राम के वनवास जाने के बाद दशरथ टूट चुके थे। वो अपने प्रिय पुत्र राम से अत्यंत प्रेम करते थे इस कारण राम का इस तरह से वियोग होने उनके लिए सदमे से कम नहीं था। अपने पुत्र के वियोग में राजा दशरथ दिनों-दिन अस्वस्थ होने लगे।

महारानी कौशल्या को लगने की अब सूर्य अस्त होने वाला है, यह महाराज के जीवन का आखिरी समय है। आज वो श्राप सिद्ध होने वाला है जो श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता ने राजा दशरथ को दिया था। यह सब सोचकर कौशल्या की आंखे आंसुओं से भर आई।

कुछ समय बाद राजा दशरथ पुत्र वियोग में राम-राम कहते हुए स्वर्ग सिधार गए। राजा दशरथ की इस तरह से आकस्मिक मृत्यु ने फिर से अयोध्यावासियों को एक गहरा सदमा दिया।

राम जी के वनवास और राजा दशरथ की मृत्यु के समय भरत और शत्रुघ्न अयोध्या में नहीं थे। दशरथ की मृत्यु के बाद दोनों भाइयों को वापिस अयोध्या आने के लिए बुलावा भेजा गया। भरत जब अयोध्या आए तो उन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा।

अपने पिता की मृत्यु और बड़े भ्राता का वनवास, ऐसी बातें सुनकर भरत व्याकुल होकर विलाप करने लगे। इसके बाद उन्हें पूरी बात का पता चला और उन्होंने अपनी माता कैकेयी को समझाया कि आपने यह क्या किया? मेरे लिए इस सिंहासन से बढ़कर मेरे भ्राता है।

दोनों भाइयों ने अपने पिता की अस्थियों का विसर्जन किया और राम जी को लाने के लिए चित्रकूट की तरफ रवानगी की। कुछ दिन के सफर के बाद भरत श्रीराम जी के पास पहुँच गए। भरत सीधे ही श्रीराम के चरणों में गिर गए और उनसे क्षमा याचना मांगने लगे।

श्रीराम ने भरत को अपने गले से लगाया और समझाया यह तो वक्त का खेल है। तो भरत ने राम से अपने साथ वापिस अयोध्या जाने को कहा। लेकिन श्रीराम ने जाने से मना कर दिया, वो अपने पिता के वचनों को झुठलाना नहीं चाहते थे।

इस तरह भरत श्रीराम की चरण पादुका लेकर अयोध्या आ गए। जिन्हें उन्होंने अयोध्या के सिंहासन पर रख दिया और स्वयं वनवासी के वस्त्रों में उस सिंहासन की सेवा करने लगे। इस तरह भरत ने अपने भ्राता से अपार प्रेम को प्रदर्शित किया।

8. शूर्पणखा की नाक काटना

इधर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण आगे वन में चले गए। एक दिन वो ऋषि अत्री के आश्रम पहुंचे, ऋषि अत्री राम को देखकर अत्यंत हर्षित हुए। फिर माता सीता, ऋषि अत्री की पत्नी अनसूयाजी से मिले। अनसूया जी ने सीता को पतिव्रत धर्म के बारे में बताया।

इसके बाद श्रीराम जी आगे प्रस्थान कर गए। जहां उनका सामना विराध नामक राक्षस से हुआ। रामजी ने अपने एक ही बाण से उस राक्षस का वध कर दिया।

इसके बाद उनकी मुलाक़ात ऋषि शरभंग जी से होती है। ऋषि शरभंग ने श्रीराम के दर्शन के बाद अपना देह त्याग दिया और वे हमेशा के लिए वैकुंठ धाम चले गए।

ऋषि शरभंग से मिलने के बाद श्रीराम जी का मुनि अगस्त्यजी, सुतीक्ष्ण (अगस्त्य का शिष्य) से मिलाप होता है और वो इस धरती से राक्षस वध की प्रतिज्ञा लेते है। रामजी की यह प्रतिज्ञा सुनकर सभी ऋषि-मुनि अत्यधिक प्रसन्न हुए।

मुनि अगस्त्य ने श्रीराम से दण्डक वन (पंचवटी) जाने की विनती की। श्रीराम जी ने उनकी विनती स्वीकार कर ली। क्योंकि दण्डक वन (पंचवटी) में ही राक्षसों का सबसे ज्यादा आतंक था। राम, सीता और लक्ष्मण कुछ ही समय बाद पंचवटी पहुँच जाते हैं। जहां वे एक कुटिया बनाकर उसमें रहने लग जाते हैं।

एक दिन शूर्पणखा (राक्षस राजा रावण की बहन) नामक की राक्षिका ने पंचवटी में राम और लक्ष्मण को देखा। वो लक्ष्मण पर मन्नमुग्ध हो गई। इसलिए उसने लक्ष्मण से विवाह करने का मन बनाया।

लेकिन शूर्पणखा ने सीता के साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की तो लक्ष्मण ने अपनी तलवार से शूर्पणखा की नाक काट दी।
इससे वो अत्यधिक क्रोधित हो गई और उन्हें इसकी सजा भुगतने के लिए तत्पर रहने को कहा।

9. माता सीता का अपहरण

शूर्पणखा ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए रावण के पास गई। उसने रावण को बहकाया की पंचवटी में एक बहुत ही सुंदर युवती निवास कर रही है।

जब मैं उसे आपके लिए लाने गई तो उसके पति के छोटे भाई ने मेरी नाक काट दी। रावण यह सुनकर अत्यधिक क्रोधित हो गया।

उसने सीता का वन से अपहरण करने की योजना बनाई। इसके लिए उसने मारीच नामक राक्षस को मोहरा बनाया। मारीच एक सुंदर स्वर्णमृग (सोने का हिरण) बनकर पंचवटी में घूमने लगा। जिसे देखकर माता सीता ने राम से इसे अपने लिए लाने को कहा। राम जी मृग के पीछे-पीछे वन में चले गए।

कुछ समय बीत जाने के बाद जब राम नहीं आए तो लक्ष्मण जी भी उनके पीछे चले गए। इधर रावण चुपके से ब्राह्मण के भेष में आकर सीता का अपहरण करके ले जाता है।

उधर राम ने जब उस मृग पर तीर चलाया तो वो अपने असल रूप में आ गया। राम, लक्ष्मण यह सब देखकर समझ गए की कुछ न कुछ अनर्थ हुआ है।

वो दौड़े-दौड़े कुटिया में वापिस आए लेकिन उन्हें वहाँ सीता नहीं मिली। सीता ने जाते वक्त एक-एक कर अपने आभूषण जमीन पर फेंक दिये। जिससे राम और लक्ष्मण को उनके जाने की दिशा ज्ञात हो गई। राम और लक्ष्मण उस दिशा में सीता की खोज करने लगे।

रास्ते में जाते हुए उन्हें जटायु नामक पक्षी घायल अवस्था में मिला, जिसने उन्हें बताया की माता सीता को राक्षसों का राजा रावण अपहरण करके ले गया है।

जटायु ने कहा कि मैंने माता जानकी को बचाने की काफी कोशिश की लेकिन मैं रावण का मुक़ाबला नहीं कर पाया। इसके बाद जटायु अपने प्राण त्याग देते है।

10. सबरी के जूठे बैर

राम, लक्ष्मण जटायु के बताए मार्ग पर चल पड़े जहां उन्होंने रास्ते में सबरी का आश्रम मिला। सबरी वृद्धावस्था में राम के आने का इंतजार कर रही थी।

एक दिन मुनि मतंगजी जी ने सबरी से कहा था कि एक दिन तुम्हारी कुटिया में पालनहार भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम पधारेंगे।
तब से सबरी श्रीराम के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। सबरी ने दोनों भाइयों के चरण धोए और उन्हें आसन्न दिया। खाने के लिए वो बैर लेकर आई।

लेकिन खाने से पहले वो प्रत्येक बैर को अपने मुंह से चखकर राम और लक्ष्मण को दे रही थी। लक्ष्मण ने राम से कहा कि यह बैर तो जूठे है। तो राम ने कहा कि माता सबरी इसलिए प्रत्येक बैर को चख रही है ताकि हम कोई खट्टा बैर न खा ले।

सबरी के इस अटूट प्रेम को देख श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद सबरी ने कहा कि आप पंपा नामक सरोवर पर जाइए, वहाँ आपकी भेंट वानरराज सुग्रीव से होगी।

11. हनुमान, सुग्रीव से मिलन

श्रीराम को अब विश्वास हो गया था कि वो अब शीघ्र ही सीता को खोज लेंगे। सबरी के बताए मार्ग पर चलते हुए श्रीराम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के नजदीक आ गए। जहां वानरराज सुग्रीव का निवास था। दूर से जब दो मुनीकुमारों को आते देखा तो सुग्रीव ने हनुमान जी से छानबीन करने को कहा।

हनुमान जी ब्राह्मण के भेष में श्रीराम जी से मिले। जब उन्हें पता लगा की वो श्रीराम है तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। हनुमान जी श्रीराम जी के चरणों में गिर गए और उन्हें बार-बार प्रणाम करने लगे। राम जी ने हनुमान जी को उठाया और अपने गले से लगा लिया।

प्रभु श्रीराम के अपार प्रेम को देखकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए और वो उन्हें सुग्रीव के पास ले आए। सुग्रीव जी श्रीराम और लक्ष्मण से मिलकर हर्षित हो उठे और उन्हें अपनी पीड़ा बताई। सुग्रीव ने कहा कि उनके भाई बाली ने उन्हें अपने राज्य से निकाल दिया है और मेरी पत्नी पर भी अपना अधिकार कर लिया है।

राम ने सुग्रीव से मित्रता करते हुए कहा कि मैं दशरथ पुत्र राम वानरराज सुग्रीव को अवश्य इंसाफ दिलाऊँगा। ऐसा कहकर उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वो जल्द ही बाली का वध करेंगे। इसके बदले में सुग्रीव ने श्रीराम को माता सीता की खोज करने का आश्वासन दिया।

12. बाली वध

श्रीराम का साथ पाकर सुग्रीव अत्यंत बलशाली हो गया। उसने बाली को गद्दा युद्ध के लिए ललकारा। बाली अपने अहंकार के वश में होकर सुग्रीव से युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। लेकिन बाली की पत्नी तारा ने बाली को समझाया, हे नाथ! ये उचित समय नहीं है युद्ध करने के लिए।

लेकिन बाली ने तारा की एक बात नहीं मानी और वो सुग्रीव से युद्ध करने के लिए मैदान में आ गए। बाली अत्यंत बलशाली था, युद्ध में कुछ ही समय बाद सुग्रीव बाली से हारने लगा। सुग्रीव को हारते देख श्रीराम ने बाली पर अपने बाण से प्रहार किया।

बाण के वेग से बाली जमीन पर गिर गया और कुछ समय बाद वो मृत्यु को प्यारा हो गया। श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त होने के कारण उसने वैंकूट धाम में जगह बनाई।

इसके बाद सुग्रीव को अपना खोया हुआ सम्मान मिला। सुग्रीव को वानरों का राजा बनाया गया और बाली पुत्र अंगद को युवराज। इस तरह से श्रीराम ने अपना मित्रता धर्म निभाया।

13. रावण की खोज

सुग्रीव के राज्याभिषेक के कुछ समय बीत जाने के बाद भी सुग्रीव ने माता सीता की खोज करने में कोई कदम नहीं उठाया। तो राम ने लक्ष्मण से इस बार में सुग्रीव से मिलने और अपना वादा याद दिलाने को कहा। राम उस समय ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे।

लक्ष्मण जी तुरंत ही किष्किंधा की तरफ प्रस्थान कर गए। किष्किंधा जाकर उन्होंने सुग्रीव और हनुमान जी को उनका वचन याद दिलाया। इसके बाद वानरराज सुग्रीव ने चारों दिशाओं में अपनी वानर सेना को सीता की खोज के लिए भेजा। तब नील, अंगद, जांबवन्त और हनुमान जी दक्षिण दिशा में गए।

इस तरह वानर सेना नदी, पहाड़, झरने पार करती हुई सीता माता की खोज करने लगी। लेकिन किसी को कोई जानकारी नहीं मिली। दक्षिण में गई हुई वानर सेना की मुलाक़ात समुन्द्र तट पर संपाती से हुई जो जटायु का भाई था। उसने उन्हें बताया की राक्षस राजा रावण सीता को समुन्द्र पार अपनी नगरी लंका में ले गया है।

इसके बाद एक विकट समस्या खड़ी हो गई। इस विशाल चार सौ कोस समुन्द्र को लांघकर कौन सीता माता का पता लगाएगा। तब जांबवन्त जी ने हनुमान जी को उनकी खोई हुई शक्ति का एहसास करवाया।

14. लंका दहन

अपनी शक्ति को वापिस पाकर हनुमान जी ने अपना विशाल आकार बना लिया। हनुमान जी ने बिना कोई देरी किए सभी को प्रणाम किया और समुन्द्र पर उड़कर तैरने लगे। उड़कर जाते हुए हनुमान जी की भेंट मैनाक पर्वत, सुरसा नामक सर्पों की माता और परछाई पकड़ने वाली राक्षसी से हुआ।

हनुमान जी परछाई पकड़ने वाली राक्षसी का वध कर आगे प्रस्थान कर गए। कुछ समय बाद हनुमान जी रावण की नगरी लंका पहुँच जाते है। सोने से बनी लंका को देखकर हनुमानजी का मन अत्यंत प्रसन्न हो गया। उन्होंने आजतक ऐसी नगरी और महल कहीं नहीं देखा।

इसके बाद वो लंका नगरी में प्रवेश करने की कोशिश करते है लेकिन वहाँ अदृश्य लंकिनी का पहरा था। जो लंका की सुरक्षा शत्रुओं से कर रही थी।

हनुमान जी ने एक ही क्षण में लंकिनी का वध कर दिया और लंका में प्रवेश कर गए। लंका में एक-एक जगह छानबीन करने के बाद भी माता सीता का पता नहीं चला।

फिर हनुमान जी की मुलाक़ात विभीषण जी से होती है और वो उन्हें सीता माता का पता बताते है। हनुमान जी तुरंत ही अशोक वाटिका में चले जाते है जहां रावण माता सीता को डरा-धमका रहा था। हनुमान जी यह सब देखकर अत्यंत दुःखी हुए। रावण के जाने के बाद वो माता जानकी से मिले और श्रीराम के बारे में बताया।

इसके बाद हनुमान जी अपने बचपन की शरारत करने लगे, उन्होंने अशोक वाटिका में हाहाकार मचा दिया। हनुमान जी की ऐसी करतूत देखकर रावण पुत्र मेघनाद हनुमान जी को बंदी बनाकर रावण के सम्मुख ले गया। रावण ने हनुमान जी से अपना परिचय पूछा तो हनुमान जी ने राम भक्त कहकर अपना परिचय दिया।

इससे रावण क्रोधित हो गया और उसने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने को कहा। जब सैनिकों ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई तो वो अपनी जलती हुई पूंछ के साथ हवा में उड़ने लगे।

फिर उन्होंने एक-एक कर पूरी लंका को जला दिया। इस तरह हनुमान जी ने लंका दहन किया। लंका दहन के बाद हनुमान जी सीता से वापिस जाने की आज्ञा ली और वो वापिस उत्तर दिशा में किष्किंधा जाने के लिए प्रस्थान कर गए।

15. रामसेतु का निर्माण

लंका से आने के बाद हनुमान जी ने श्रीराम को माता जानकी के बारे में बताया। हनुमान जी का सीता के बारे में समाचार लाने पर राम अत्यंत प्रसन्न हुए।

उन्होंने हनुमान जी को अपने गले लगा लिया। अब सभी को सीता का पता चल गया, इसलिए वानरराज सुग्रीव ने बिना देरी किए जल्द ही समुन्द्र तट की ओर रवानगी की। पूरी वानर सेना उत्साह से समुन्द्र तट पर पहुँच गई।

उधर लंका में रावण ने सभा बुलाई। उस सभा में सभी ने अपने-अपने मत दिये और कहा की वो इतने विशाल समुन्द्र को लांघकर कभी भी नहीं आ सकते।

इसी बीच विभीषण ने अपना मत रखा, विभीषण ने कहा की महाराज मैं आपका छोटा भाई आपसे विनती करता हूँ कि आप सीता को लौटा दें, नहीं तो पूरी राक्षस जाती का विनाश निश्चित है।

रावण ने इतना सब सुनकर विभीषण का अपमान कर उन्हें देशद्रोह के आरोप में अपने राज्य से निकाल दिया। इसके बाद विभीषण जी राम के चरणों में आ गए। श्रीराम ने उन्हें अपना मित्र बना लिया।

समुन्द्र तट पर पूरी वानर सेना पहुँच चुकी थी, लेकिन अब वही सबसे बड़ा सवाल कि इतने विशाल समुन्द्र को कैसे पार करें? तब समुन्द्र देवता ने प्रकट होकर इसका उपाय बताया।

उन्होंने कहा कि आपकी सेना में नर और नील नामक दो वानर हैं। उन्हें ऐसा वरदान प्राप्त है कि उनके स्पर्श से बड़े से बड़े पत्थर भी समुन्द्र पर तैरने लगते हैं।

इस तरह से सभी वानरों ने एक-एक पत्थर जोड़कर एक पुल बनाया। जिसे रामसेतु कहा गया, क्योंकि इसके एक-एक पत्थर पर जय श्रीराम लिखा हुआ था।

16. युद्ध की शुरुआत

रामसेतु बनने के बाद वानर सेना समुन्द्र लांघकर लंका नगरी के सम्मुख खड़ी हो गई। रावण को अब भय महसूस होने लगा। वानर सेना ने सूबेल पर्वत पर अपना निवास स्थान बनाया और यहीं से युद्ध की तैयारी करने लगे।

लेकिन श्रीराम ने अपनी उदारता और दयालुता प्रस्तुत करते हुए रावण को एक बार फिर समझाने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने बाली पुत्र अंगद को रावण की सभा में भेजा। लेकिन रावण अपने अहंकार के वश में उस दूत को पहचान नहीं पाया।

अगर उस दिन रावण अपने अहंकार को त्याग देता तो शायद उसका विनाश नहीं होता। बाली पुत्र अंगद वापिस लौट आए। अब युद्ध निश्चित था, वानर सेना जय सिया राम, जय लक्ष्मण के जयकारे लगाती हुई युद्ध के मैदान में आ गई।

इधर राक्षस सेना भी युद्ध के मैदान में डटकर खड़ी हो गई। कुछ ही समय बाद शंख की ध्वनि सुनाई दी और दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया।

युद्ध के पहले दिन रावण की सेना को भारी क्षति हुई। अगले दिन रावण ने अपने प्रिय और शूरवीर पुत्र मेघनाद को युद्ध क्षेत्र में भेजा। रावण पुत्र मेघनाद अत्यंत बलशाली और पराक्रमी था। उस समय उसके जैसा पराक्रमी योद्धा शायद ही इस धरती पर था।

मेघनाद ने राम और लक्ष्मण को युद्ध के लिए ललकारा। तो लक्ष्मण जी ने श्रीराम से आज्ञा लेकर मेघनाद से युद्ध करने की इच्छा जताई। दोनों में भीषण युद्ध हुआ, तीनों लोकों में बाणों की ध्वनि सुनाई देने लगी।

ऐसा भंयकर युद्ध शायद ही कभी हुआ हो, तभी मेघनाद का एक बाण लक्ष्मण जी को आकार लगा। लक्ष्मण जी शक्ति के प्रहार से वहीं मूर्छित हो गए।

तभी श्रीराम वहाँ आए, लक्ष्मण को इस तरह देखकर श्रीराम व्याकुल हो गए। तब विभीषण जी ने कहा कि लंका में सुषेण वैद्य इस घातक अस्त्र का उपाय बता सकते हैं।

हनुमान जी तुरंत ही सुषेण वैद्य को उठा लाए और उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि संजीवनी बूटी ही इसका एकमात्र उपाय है। जो आपको हिमालय पर्वत पर मिलेगी।

17. हनुमान जी द्वारा संजीवनी लाना

सुषेण वैद्य की बताई संजीवनी बूटी लाने के लिए हनुमानजी ने श्रीराम से अनुरोध किया। तो श्रीराम ने व्याकुल मन से हनुमान को कहा की तुम जल्द ही आना और मेरे लक्ष्मण को बचा लेना। नहीं तो मैं अपनी माता को क्या उत्तर दूंगा। हनुमान जी शीघ्र ही हिमालय के लिए रवाना हो गए।

रास्ते में उनकी मुलाक़ात कालनेमी राक्षस से हुई जिसे रावण ने हनुमानजी के मार्ग में अवरोध पैदा करने के लिए भेजा था। लेकिन हनुमान जी ने कालनेमी का अपने बल से वध कर दिया।

कुछ ही समय बाद वो हिमालय पर्वत पर पहुँच गए। लेकिन वो संजीवनी को पहचान नहीं पाए, इस कारण उन्होंने पूरे पर्वत को ही उठा लिया।

जब हनुमान जी पर्वत उठाए आकाश मार्ग से अयोध्या पर आए तो वो श्रीराम का जयकारा लगा रहे थे। भरत ने जब यह सुना तो उन्होंने हनुमान जी पर बाण चला दिया। लेकिन जब उन्हें पता चला की यह तो श्रीराम के ही दूत है तो उन्होंने उनका इलाज कर वापिस रवाना कर दिया।

सुबह होने से ठीक पहले हनुमान संजीवनी पर्वत उठा लाए। सुषेण वैद्य ने औषधि की पहचान कर लक्ष्मण का इलाज शुरू किया। थोड़े से इलाज के बाद लक्ष्मण होश में आ गए। श्रीराम लक्ष्मण को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इसका श्रेय हनुमान जी को दिया।

18. कुंभकर्ण वध

युद्ध में मिल रही लगातार विफलताओं के कारण रावण ने अपने भाई कुंभकर्ण को उठाने का फैसला किया। रावण ने कुंभकर्ण को अपनी व्यथा सुनाई, तो कुंभकर्ण ने रावण से कहा की भईया आपने यह बहुत बड़ा अनर्थ किया है। सीता कोई साधारण स्त्री नहीं है, आपने स्वयं काल को अपने द्वार पर आमंत्रित किया है।

रावण क्रोधित होकर बोला कुंभकर्ण अगर तुम में हिम्मत नहीं है तो वापिस सो जाओ। मुझे कभी भी अपना मुख मत दिखाना। कुंभकर्ण ने कहा की मैं सिर्फ आपको समझा रहा हूँ। मैं युद्ध भूमि में कभी पीठ नहीं दिखाऊँगा। आपके लिए युद्ध करते हुए अगर मैं वीरगति को भी प्राप्त हो गया तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।

कुंभकर्ण इतना कहकर युद्ध भूमि में चला जाता है। कुंभकर्ण का सबसे पहले सामना हनुमान जी से हुआ, हनुमान जी ने अपनी गद्दा से प्रहार किया। जिससे कुंभकर्ण वहीं गिर गया। लेकिन कुंभकर्ण ने खड़े होकर हनुमान जी पर प्रहार किया, जिससे हनुमान जी वहीं गिर गए।

कुंभकर्ण ने पूरी वानर सेना में हाहाकार मचा दिया। वो वानर सेना को कीड़े-मकोड़ों की तरह मसल रहा था। नल, नीर, अंगद, सुग्रीव सभी उसका सामना नहीं कर पाए और पराजित होकर वापिस आ गए। तब श्रीराम ने कुंभकर्ण को युद्ध के लिए ललकारा।

कुंभकर्ण ने साहस से राम के साथ युद्ध किया। परंतु परमेश्वर के सामने ज्यादा देर तक कौन टिक पाता है। श्रीराम ने अपने एक बाण से कुंभकर्ण का वध कर दिया। श्रीराम के हाथों मृत्यु पाकर कुभकर्ण ने परम धाम में अपना स्थान बनाया।

19. मेघनाद वध

कुंभकर्ण वध के बाद रावण अंदर से टूट चुका था। अब उसके पास युद्ध करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इसलिए उसने एक बार फिर से अपने प्रिय पुत्र मेघनाद को युद्ध क्षेत्र में भेजा। मेघनाद उसी वक्त मायामय रथ पर सवार होकर आकाश में जाकर गरजने लगा।

मेघनाद इस बार ज्यादा बलशाली नजर आ रहा था। उसने चारों दिशाओं में वानर सेना पर अपने अस्त्र बरसाए। जिससे वानर सेना में भय उत्पन्न हो गया। मेघनाद अब मायावी युद्ध करने लगा, वो एक पल में इधर तो दूसरे पल में उधर होता।

मेघनाद ने हनुमान, सुग्रीव, अंगद, विभीषण, नल, नील आदि को घायल कर दिया। इसके बाद उसने राम और लक्ष्मण से युद्ध किया और उन्हें नागपाश में बांध दिया। लेकिन हनुमान जी ने गरुड़ देवता की मदद से उस नागपाश को विफल कर दिया।

मेघनाद अपने नागपाश विफल होने के बाद और अत्यधिक क्रोधित हो गया। इस बार मेघनाद ने अजेय यज्ञ करने का निर्णय लिया। इस यज्ञ के पूरा होते ही मेघनाद इस युद्ध में अजेय हो जाएगा, फिर उसे कोई नहीं हरा सकेगा। लेकिन लक्ष्मण, हनुमान और विभीषण ने इस यज्ञ को सम्पन्न नहीं होने दिया।

एक बार फिर से लक्ष्मण और मेघनाद दोनों युद्ध के क्षेत्र में आमने-सामने खड़े थे। मेघनाद ने लक्ष्मण पर भंयकर से भंयकर अस्त्र चलाए, लेकिन लक्ष्मण जी पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

लक्ष्मण ने मेघनाद के माया जाल को तोड़कर ऐसा बाण चलाया जिसने मेघनाद के सिर को धड़ से अलग कर दिया। इस तरह मेघनाद वीरों की तरह लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।

20. रावण वध

अपने प्रिय पुत्र, भाई और अन्य राक्षस योद्धाओं की मृत्यु के बाद रावण अकेला राक्षस योद्धा बचा था। रावण अत्यंत बलशाली योद्धा था। उसे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त था। रावण राक्षसों की अपार सेना के साथ रणक्षेत्र में चला और वानरों और राक्षसों में भीषण युद्ध हुआ।

सबसे पहले लक्ष्मण जी ने रावण को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच में भंयकर युद्ध हुआ। रावण ने एक से बढ़कर एक भंयकर अस्त्र चलाए। लेकिन लक्ष्मण ने एक-एक अस्त्र को काट फेंका।

लक्ष्मण से युद्ध के बाद रावण का सामना हनुमान जी से हुआ। एक शिव भक्त तो दूसरा शिव का अवतार, दोनों पराक्रमी वीरों की तरह लड़ रहे थे। अंत में रावण ने अपनी माया का प्रयोग कर हनुमानजी को गिरा दिया। लेकिन श्रीराम ने अपनी विद्या से रावण की माया को नष्ट कर दिया।

इस तरह सूर्यास्त हो गया। अगले दिन फिर रावण युद्ध क्षेत्र में खतरनाक अस्त्रों के साथ पहुंचा, आज रावण को देखकर लग रहा था कि आज शायद युद्ध का निर्णय हो जाएगा। राम-रावण में से कोई एक योद्धा ही बचेगा। इधर राम भी पूरी तैयारी से युद्ध क्षेत्र में आ गए।

राम, रावण में विनाशकारी युद्ध शुरू हो गया। इधर रावण अपने मायाजाल से युद्ध कर रहा था, उधर राम अपनी विद्या और पराक्रम से युद्ध कर रहे थे। कौन किस पर भा]री है, इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा था। दोनों ही पराक्रमी और बलशाली थे।

राम सत्य और धर्म के पुजारी थे, जबकि रावण असत्य और अधर्म। इसलिए राम ने धर्म की शक्ति से रावण को मौत के घाट उतार दिया। रावण के वध से तीनों लोकों में राम की जय होने लगी।

देवताओं ने राम-लक्ष्मण पर पुष्पवर्षा की। इस तरह लंकापति रावण का अंत हुआ और धरती पर धर्म की स्थापना हुई।

21. माता सीता की अग्निपरीक्षा

रावण की मृत्यु के बाद विभीषण को लंका का सम्राट बनाया गया। राजा बनने के बाद विभीषण जी श्रीराम के पास पधारे। तब श्रीराम ने वानर-रीछ सेना का धन्यवाद किया।

श्रीराम ने कहा कि तुम्हारे ही बल से आज दुराचारी रावण मारा गया। राम और पूरी अयोध्या नगरी आपका यह ऋण कभी नहीं उतार पाएगी।

राम ने सबका धन्यवाद करने के बाद हनुमान जी को माता सीता के पास भेजा। तब हनुमानजी माता सीता के पास गए और उनसे सकुशल होने का समाचार लेकर आए। इसके बाद श्रीराम ने विभीषण, अंगद और हनुमान से कहा कि तुम जानकी के पास जाओ और उन्हें पूरे आदर के साथ यहाँ ले आओ।

सीता के आने के बाद श्रीराम ने अपनी लीला दिखाते हुए सीता से अग्निपरीक्षा देने को कहा। ताकि समाज में कोई भी सीता की पवित्रता पर अंगुली न उठा पाए। तब अग्नि देव ने प्रकट होकर कहा की हे राम, सीता पहले की तरह पवित्र है। इस तरह सीता ने अग्नि में अपनी पवित्रता की परीक्षा दी।

22. वनवास का अंत

रावण वध के बाद श्रीराम के वनवास का अंत भी नजदीक आ गया था। राम प्रतिदिन अपने भाई भरत को याद करते। वो सभी से कहते कि मेरा भाई भरत तपस्वी के भेष में मेरा इंतजार कर रहा है। मुझे अब जल्दी से अयोध्या जाना है।

तब विभीषण जी ने कहा कि हे नाथ! आप मुझे अपने साथ अयोध्या ले चलिए। श्रीराम ने विभीषण के कोमल वचन सुनकर उन्हें भी अपने साथ ले जाने को कहा। विभीषण जी हर्षित होकर महल में गए। विभीषण जी ने बिना देरी किए पुष्पक विमान को श्रीराम जी के सामने लाकर खड़ा कर दिया।

विभीषण जी ने कहा हे नाथ! यह पुष्पक विमान अब से आपका ही है। इसमें अयोध्या जाने में हमें ज्यादा समय नहीं लगेगा। तब राम, सीता, लक्ष्मण, अंगद, सुग्रीव, जाम्बवत, नर, नील, हनुमान तथा विभीषण विमान में सवार होकर अवध की ओर प्रस्थान कर गए।

रास्ते में श्रीराम अगस्त्य मुनि से दंडक वन में मिले। सबका आशीर्वाद पाकर वो चित्रकूट आए। जहां उन्होंने तमाम ऋषि-मुनियों को प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद लिया। राम ने सीता को मार्ग में आने वाले नदी-पहाड़, पवित्र स्थानों के दर्शन करवाए। थोड़े समय बाद वो अयोध्या पहुँच गए।

23. श्रीराम का राज्याभिषेक

श्रीराम जी के अयोध्या पहुँचने से पहले अवधपुरी को बहुत ही सुंदर सजाया गया। सभी अयोध्यावासियों ने अपने घरों में घी के दीपक जलाए। अयोध्या पहुँचने के बाद तीनों भाइयों ने अपनी जटाओं को खोला और सरयू में स्नान किया। इसके बाद तीनों ने तपस्वी का भेष त्यागकर राजकुमारों का भेष धारण किया।

स्नान होने के बाद ऋषि वशिष्ठ ने अयोध्या के दिव्य सिंहासन को मंगवाया। सभी को प्रणाम कर रामजी उस सिंहासन पर विराजमान हो गए। उनके पास में ही माता सीता भी विराजमान हो गई। सीता-राम सिंहासन पर बैठे अत्यंत ही आकर्षक लग रहे थे।

यह समय श्रीराम के राज्याभिषेक का था। तीनों लोकों से देवी-देवता, भगवान शिव, ब्रह्मा जी, ऋषि-मुनि अनेक महापुरुष पधारे हुए थे। कोई भी इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। ब्राह्मणों ने मंत्रों का उच्चारण शुरू किया। ऋषि वशिष्ठ ने श्रीराम के तिलक कर उनका राज्याभिषेक किया।

पुत्र को राजसिंहासन पर बैठा देखकर तीनों माताएँ प्रफुल्लित हो उठी। ब्राह्मणों को जी भर कर दान किया गया सभी अत्यंत खुश थे। तीनों लोकों में जय सियाराम के जयकारे गूंज रहे थे। इस तरह से श्रीराम जी 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान हुए।

24. माता सीता का त्याग

श्रीराम के अयोध्या नरेश बनने के बाद रामराज्य की शुरुआत हुई। रामराज्य में सभी अपना खुशहाल जीवन व्यतीत करते थे। किसी को कोई पीड़ा और दुःख नहीं था। मर्यादपुरुषोत्तम श्रीराम राजा होने के कारण सभी अपने धर्म का पालन करते। इसलिए उनके जीवन में कोई पीड़ा नहीं थी।

रामराज्य में सभी दीर्घ आयु तक जीते, सभी के शरीर सुंदर और निरोगी थे। रामराज्य में न कोई गरीब था, न कोई अमीर। सब एक जैसे थे, चारों ओर सिर्फ भक्ति ही भक्ति थी।

किसी के मन में कोई छल, द्वेष नहीं था। पेड़ों पर लद-लदकर फल लगते, पशु-पक्षी मीठे बोल बोलते। सूर्य उतना ही तपता, जितना जीव सहन कर पाते। वर्ष उतनी होती, जितनी फसलों के लिए आवश्यक होती।

इस तरह रामराज्य में सभी खुश थे। पाप, घमंड, अहंकार ऐसा कुछ भी रामराज्य में नहीं था। महल में सभी मिल-जुलकर रहते। इस दौरान माता सीता गर्भवती हो गई।

एक दिन श्रीराम ने प्रजा का हाल जानने की योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने एक साधारण व्यक्ति का भेष धारण किया। प्रजा का हाल जानते-जानते वो एक ऐसी जगह पहुँच गए, जहां माता सीता की बात हो रही थी।

कुछ लोग माता के चरित्र पर सवाल उठा रहे थे, वो कह रहे थे सीता रावण के महल में रहकर आई है। पता नहीं वहाँ उसके साथ क्या हुआ होगा?

राम वापिस अपने महल आ जाते है। प्रजा में सुनी गई ऐसी कड़वी बातें, राम को बार-बार याद आ रही थी। उनका मन व्याकुल हो रहा था। वो अपने मन की बात किसी को बताना नहीं चाहते थे, लेकिन सीता जी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अयोध्या छोड़ने का निर्णय लिया।

श्रीराम ने अपनी प्रजा के लिए अपनी पत्नी का त्याग कर दिया। लक्ष्मण जी सीता को रात के अंधेरे में वन में छोड़ आए। वन में सीता जी की भेंट रामायण रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी से होती है।

वाल्मीकि जी सीता को अपने आश्रम ले आते है। जहां सीता जी अपनी पहचान छुपाकर एक साधारण तपस्विनी के भेष में रहने लग जाती है।

25. लव-कुश का जन्म

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में सीता ने दो बच्चों को जन्म दिया, जिनका नाम वाल्मीकि जी ने लव और कुश रखा। लव-कुश दोनों भाई सुशील और सुंदर थे। उनके मुख पर सूर्य के समान तेज था।

महर्षि वाल्मीकि जी ने दोनों को अपना शिष्य बना लिया। दोनों भाई उत्तम प्रवृति के बालक थे। उनमें शिक्षा ग्रहण करने का उत्साह सबसे विचित्र था।

दोनों भाई महर्षि वाल्मीकि की दिन-रात सेवा करते। अपनी माता की वो हर प्रकार से सहायता करते। धीरे-धीरे दिन बीतते गए, दोनों भाई अब किशोरावस्था में पहुँच गए।

महर्षि वाल्मीकि जी ने दोनों भाइयों को धनुर्विद्या में निपुण कर दिया। उन्हें एक से बढ़कर एक शक्तिशाली अस्त्र दिये। एक दिन वाल्मीकि जी दोनों भाइयों को रामायण की कथा सुनने का निर्णय लिया।

दोनों भाई ध्यान अवस्था में गुरुजी के सामने बैठ गए। वाल्मीकि जी ने एक-एक कर पूरी रामायण लव-कुश को सुना दी। तब तक दोनों भाई अपने पिता के बारे में नहीं जानते थे और न ही उन्हें अपनी माता के बारे में पता था। इस तरह से दोनों भाई सीता के त्याग के लिए श्रीराम को दोषी समझने लगे।

26. अश्वमेघ यज्ञ

उधर अयोध्या में राम प्रतिदिन सीता को याद करते। उन्होंने सीता को ही अपनी पत्नी माना था, इसके अलावा उन्होंने किसी से विवाह नहीं किया। एक दिन ऋषि वशिष्ठ श्रीराम से मिलने उनके पास पहुंचे। ऋषि वशिष्ठ ने राम से कहा की प्रभु आपको अब अश्वमेघ यज्ञ करना चाहिए।

आपने रावण जैसे दुराचारी का वध किया था। लेकिन फिर भी आपके हाथों से हत्या हुई थी, आपको उस हत्या का प्रायश्चित करना चाहिए। श्रीराम को उनका विचार अति उत्तम लगा। उन्होंने तुरंत ही अपने मंत्रीगणों से अश्वमेघ यज्ञ की तैयारी करने को कहा।

अश्वमेघ यज्ञ में एक अश्व (घोड़े) को खुला छोड़ा जाता था। उसके गले में अश्वमेघ यज्ञ करने वाली की पूरी जानकारी निहित होती थी। वो जहां-जहां से गुजरता, वहाँ-वहाँ उस सम्राट का अधिकार हो जाता।

अगर किसी को यज्ञ करने वाले की अधीनता स्वीकार नहीं है तो वो उस घोड़े को रोक लेता और उसे युद्ध की चुनौती देता। श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ में माता सीता की सोने की मूर्ति बनवाई, क्योंकि यह यज्ञ बिना पत्नी के सम्पन्न नहीं हो सकता था। श्रीराम जी ने अपने अस्तबल से एक सुंदर से घोड़े को इस यज्ञ के लिए चुना। फिर उस घोड़े को खुला छोड़ दिया।

एक दिन वो घोड़ा वन से गुजर रहा था तो उसे लव-कुश ने देख लिया। उन्हें वो घोड़ा अत्यंत सुंदर लगा, इसलिए उन्होंने उसे पकड़ लिया। पकड़ने के बाद जब लव-कुश ने घोड़े के गले में बंधे पत्र को पढ़ा तो उन्हें मालूम पड़ा की यह श्रीराम का घोड़ा है। रामायण जानने के बाद वो श्रीराम से मिलना चाहते थे, और यह उनके लिए किसी अवसर से कम नहीं था।

उधर अयोध्या नगरी में यज्ञ के घोड़े का वापिस न आने पर श्रीराम को चिंता होने लगी। इसके लिए उन्होंने शत्रुघ्न को इसकी जांच-पड़ताल करने के लिए भेजा। लेकिन लव-कुश ने अपने पराक्रम से शत्रुघ्न को मूर्छित कर दिया।

इसके बाद हनुमान जी आए, उन्हें भी दोनों भाइयों ने बंदी बना लिया। उसके बाद लक्ष्मण और भरत आए लेकिन वो भी दोनों भाइयों के पराक्रम के सामने टिक नहीं पाए।

लव-कुश के बाणों से वो मूर्छित हो गए। इसके बाद वानरराज सुग्रीव आते है लेकिन वो भी उनसे पराजित हो जाते है। इतने महाबली योद्धाओं के इस तरह पराजित होने के बाद राम स्वयं आते है।

तब वो दोनों बालकों को उस अश्व को छोड़ने के लिए कहते है। लेकिन दोनों भाई मना कर देते है और कहते है कि आपने इस घोड़े के गले में युद्ध की चुनौती दी है। हमने इस युद्ध की चुनौती को स्वीकार कर लिया। अब आप सिर्फ हमें यहाँ से पराजित करके ही इस घोड़े को ले जा सकते हैं।

27. लव-कुश का अपने पिता श्रीराम से मिलन

दोनों बालकों और श्रीराम के बीच जब युद्ध के लिए धनुष पर बाण चढ़ने वाले होते हैं। उतने में ही महर्षि वाल्मीकि जी वहाँ पहुँच जाते है। वाल्मीकि जी दोनों भाइयों को उस अश्व को लौटने का आदेश देते है। श्रीराम ने वाल्मीकि जी को प्रणाम किया और वो उस घोड़े को लेकर अयोध्या वापिस आ गए।

इस तरह से श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ को सम्पन्न किया। तथा वो एक चक्रवर्ती सम्राट बने। एक दिन महर्षि वाल्मीकि जी लव-कुश और माता सीता को लेकर अयोध्या नगरी में आ गए।

तब उन्होंने लव-कुश का परिचय श्रीराम से करवाया। सीता ने श्रीराम को अपनी दोनों सन्तानें सौंपी। इसके बाद उन्होंने धरती माता को याद किया।

धरती माता को याद करते ही, पूरी जमीन फट गई। धरती से एक आसन निकला, सीता उस आसन पर बैठकर धरती की गोद में समा गई। राम ने उन्हें रोकने के लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन वो अपनी माँ के पास वापिस चली गई। पूरी अयोध्या नगरी उस दिन बहुत रोई थी, श्रीराम तो अपना होश खो बैठे।

सीता के जाने के बाद राम लव और कुश को अपने गले से लगाते हैं। उन्हें अपने पुत्र रूप में पाकर वो अत्यंत प्रसन्न रहने लगे, लेकिन वो सीता का गम भूल नहीं पा रहे थे। दोनों भाई अपने पिता की दिन-रात सेवा करते।

28. श्रीराम का विष्णु धाम में प्रस्थान

इस तरह दिन बीतते गए, श्रीराम अपने इस अवतार का कार्य पूरा कर चुके थे। इसलिए एक दिन स्वयं काल उनसे मिलने आए। जब दोनों अकेले में बातचीत कर रहे थे तो लक्ष्मण जी वहाँ आ जाते है।

बातचीत के बीच में आने के कारण श्रीराम लक्ष्मण को देश निकाला दंड देते है। इस तरह से लक्ष्मण जी जो शेषनाग के अवतार थे, समुन्द्र में जाकर अपने असली रूप में आ जाते हैं।

उधर श्रीराम भी सरयू नदी के किनारे अपना देह त्याग करते है। अपने प्रिय भक्तों के साथ वे भी अपने धाम चले जाते है। इस तरह से श्रीराम के ऐतिहासिक जीवन का अंत होता है। श्रीराम के बाद लव-कुश अयोध्या के नरेश बने।

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