दिवाली क्यों मनाया जाता है

दीपावली अपने आप में ही एक बहुत बड़ा त्यौहार है। भारत में सबसे ज्यादा हिंदू निवास करते हैं, जिनकी दीपावली मुख्य त्यौहारों में से एक हैं। हालांकि अन्य धर्मों में भी दीपावली को एक बड़े और समृद्ध त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। दीपावली भाईचारे का त्यौहार है, इस दिन सभी अपने पुरानी दुश्मनी को भूलकर दोस्ती की एक नई शुरुआत करते हैं।

गांवों में दीपावली के दिन सभी एक साथ इकट्ठे होकर इस त्यौहार को मनाते हैं, जिससे उनके बीच प्रेम संबंध और भी ज्यादा मजबूत होता है। यह एक त्यौहार से ज्यादा एक भावना है, जो लोगों के दिल में समय के साथ विकसित हुई है। दीपावली को दीपावली के नाम से भी जाना जाता है।

दीपावली मनाने के बहुत से कारण है, अलग-अलग धर्मों में इसे अलग-अलग कारण से मनाया जाता है। प्रत्येक धर्म में इसको लेकर अपनी एक मान्यता है। लेकिन यह त्यौहार हिंदुओं में सदियों से भाईचारे का संबंध विकसित कर रहा है। यहाँ एक बात जानना बहुत जरूरी है कि ‘दिवाली’ शब्द पूरी तरह से गलत है, सही शब्द दीपावली ही है।

आइए जानते हैं कि आखिर दीपावली का इतिहास क्या है? दीपावली क्यों मनाई जाती है? और अलग-अलग धर्मों में इसको लेकर क्या-क्या मान्यताएँ है? जिसमें हम सबसे पहले हिन्दू धर्म में दीपावली के बारे में जानेंगे और साथ ही इस दिन लक्ष्मी पूजन क्यों किया जाता है? इसके बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

दिवाली क्यों मनाई जाती है

diwali kyu manaya jata hai

हिंदू धर्म में दीपावली

हिंदू धर्म में दीपावली का एक अलग ही महत्व हैं। हिंदू रीति-रिवाजों में दीपावली के दिन लोग अपने सभी कामों का अवकाश करते हैं। इस दिन रात को घरों में सरसों तेल के दीपक जलाए जाते हैं। जिससे पूरा वातावरण शुद्ध हो जाता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

कहते हैं कि इस दिन माता लक्ष्मी (धन की देवी) की पूजा करने से धन और वैभव की प्राप्ति होती है। सही समय और सही तरीके से पूजा करने पर इस दिन लक्ष्मी माता और धन कुबेर का घर पर आगमन होता है। इसके अलावा इस दिन सभी एक-दूसरे का मुँह मीठा कर भाईचारे का संदेश देते हैं।

श्रीराम का वनवास से लौटना

रामायण भारतीय इतिहास के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है। दीपावली मनाने के पीछे रामायण से जुड़ा एक शानदार किस्सा है। रामायण में मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन को दर्शाया गया है। जिसे महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था। हालांकि बाद में तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस लिखी, जो रामायण का ही एक हिस्सा है।

रामायण में अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े राम थे। जब राजा दशरथ वृद्धावस्था की स्थिति में पहुंचे तो उन्होंने राजकुमार राम को राजा बनाने का निर्णय लिया। क्योंकि राम अपने चार भ्राताओं में सबसे बड़े और पराक्रमी थे। साथ ही वे कोमल हृदय के इंसान थे, एक तरह से कहें तो एक राजा के सभी गुण राम में निहित थे।

अपने में इन्हीं गुणों के कारण अयोध्या की प्रजा भी राम को बहुत स्नेह करती थी। राजकुमार राम भी अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे। दशरथ की तीन रानियाँ थी, जिनमें राम सबसे बड़ी रानी कौशल्या के पुत्र थे। भरत रानी कैकेयी और शत्रुघ्न, लक्ष्मण रानी सुमित्रा के पुत्र थे।

चारों भाइयों का विवाह राजा जनक की सुपुत्रियों के साथ हुआ। जिनमें राम की पत्नी का नाम सीता और लक्ष्मण की पत्नी का नाम उर्मिला था। रामायण में राम ने सीता स्व्यंबर में दिव्य शिव धनुष तोड़कर सीता संग विवाह किया। जिस धनुष को राम ने तोड़ा, वो किसी भी राजा से उठाया नहीं गया था।

चारों भाइयों के विवाह के बाद जब राम को राजा बनाने की घड़ी आई तो मंथरा नाम की दासी से यह सहा नहीं गया। उसने रानी कैकेई को भरत को राजा बनाने के लिए भड़काना शुरू कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप कैकेई ने दशरथ से राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज सिंहासन मांगा।

राम ने अपनी माता की सभी मांगों का मान रखते हुए अयोध्या से 14 वर्ष वनवास के लिए निकल पड़े। राम के साथ उनकी पत्नी सीता और लक्ष्मण भी वनवासी बन गए। इस तरह से वो वन में अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

लेकिन वनवास के आखिरी समय में राक्षस राजा रावण सीता को छल से ज़बरदस्ती अपहरण कर अपने राज्य लंका ले गया। जिसके बाद दोनों भाई मिलकर सीता की खोज करने लगे। रास्ते में उनकी मुलाक़ात वानरराज सुग्रीव और हनुमान जी से होती है।

फिर सभी मिलकर सीता की तलाश में निकल पड़ते हैं, जहां उन्हें पता चलता है कि वे अभी रावण की लंका नगरी में है। इसके बाद राम अपनी वानर सेना के साथ लंका के लिए प्रस्थान कर जाते हैं, जहां उनका राक्षसों के साथ भयंकर युद्ध होता है।

इस युद्ध में रावण की मृत्यु हो जाती है। इस दिन को आज दशहरे के रूप में मनाया जाता है। इसके 20 दिन बाद राम, सीता और लक्ष्मण अपने 14 वर्षों का वनवास पूर्ण कर घर लौटते हैं। जिसकी खुशी में सभी अयोध्यावासी अपने घरों में घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत करते हैं।

बस इसी दिन से दीपावली की शुरुआत होती है। आज भी भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीपक जलाकर अपनी श्रद्धा और खुशी व्यक्त करते हैं। तो इस तरह से ‘दीपावली’ की शुरुआत हुई थी, जो आज भी करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा है।

माता लक्ष्मी का अवतार

कहते हैं कि इस दिन धन की देवी माता लक्ष्मी का अवतार हुआ था। हिन्दू लोग लक्ष्मी माता की पूजा और भक्ति सच्चे मन से करते हैं। कहते हैं कि इस दिन माता लक्ष्मी समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई थी। जो देवताओं और राक्षसों के बीच हजारों वर्षों तक चला था।

बात उस समय है कि जब राक्षसों और देवताओं के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था। एक बार देवताओं ने अपने प्रक्रम से राक्षसों को हरा दिया। जिसके परिणामस्वरूप वो देवताओं से बचने के लिए पाताल लोक में छिप गए। देवताओं के इस पराक्रम के पीछे माता लक्ष्मी का हाथ था।

एक समय ऐसा आया जब देवता अपनी विजय के कारण घमंडी हो गए, जिस कारण उनके हाथों दुर्वासा ऋषि का अपमान हो गया। दुर्वासा ऋषि ने क्रोध में आकार देवताओं को श्राप दिया कि ‘जिस कारण तुम्हें यह पराक्रम प्राप्त हुआ है, वो अब राक्षसों के पास चली जाएगी।

ऋषि के इस श्राप के कारण महालक्ष्मी पाताल में चली गई और असुरों पर अपनी कृपा बरसाने लगी। इस घटना के बाद देवता कमजोर और असुर बलशाली हो गए। असुर अत्यधिक बल के कारण अब स्वर्गलोक का सिंहासन हड़पने की कोशिश करने लगे। जिससे दुःखी होकर देवता ब्रह्माजी के पास गए।

तो ब्रह्माजी ने उनको समुद्र मंथन करने की सलाह दी। उन्होंने देवताओं को समझाया कि महालक्ष्मी जी सिर्फ इसी विधि से ही वापिस स्वर्गलोक में आ सकते हैं। इस तरह से देवताओं और असुरों के मध्य समुद्र मंथन हुआ और कार्तिक अमावस्या को लक्ष्मी जी समुद्र से स्वर्गलोक गए।

जब महालक्ष्मी का यह अवतार फिर से हुआ तो सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। इस तरह से हर वर्ष दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है। कहते हैं कि इस दिन घर में रोशनी करने से इनका आगमन होता है। जिससे घर में सुख, समृद्धि, वैभव, धन आदि सुखों का भी आगमन होता है।

पांडवों का वनवास पूरा हुआ

महाभारत, रामायण की ही तरह हिंदुओं की आस्था से जुड़ा एक ग्रंथ है। भारत के इतिहास में बहुत से बहुत भयंकर युद्ध हुए हैं। जिनमें महाभारत सबसे बड़ा और विनाशकारी युद्ध माना जाता है। महाभारत के अनुसार इस युद्ध में भारतवर्ष (पुराने समय में पूरा भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान) के सभी राजाओं ने भाग लिया था।

इस युद्ध की शुरुआत तब होती है, जब पांडवों और कौरवों के बीच दुश्मनी का बीज बोया गया। बहुत समय पहले हस्तिनापुर नामक राज्य हुआ करता था। जिसके राजा धृतराष्ट्र थे, जिन्हें दिखाई नहीं देता था। उनके 100 पुत्र हुए जो कौरव कहलाए। वहीं उनके भाई पांडु के पाँच पुत्र (युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव) हुए, जो पांडव कहलाए

शुरुआत में धृतराष्ट्र को बड़ा राजकुमार होने के कारण राजा बनाया जाना था, लेकिन उनकी दृष्टि न होने के कारण महाराज पांडु को राजा बनाया गया। परंतु कुछ समय बाद महाराज पांडु अपना राज-पाट छोडकर वन में चले गए। जिस कारण धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर की गद्दी मिली।

धृतराष्ट्र का विवाह गांधार नरेश की सुपुत्री गांधारी से हुआ था। जिनका भाई शकुनि उनके साथ हस्तिनापुर ही रहने लगा। शकुनि अपनी निजी दुश्मनी के कारण हस्तिनापुर का विनाश चाहता था। इसलिए उसने कौरवों और पांडवों के बीच दुश्मनी का बीज बोना शुरू कर दिया।

एक दिन यही बीज बड़ा होकर उन्हें विनाश के मोड़ पर ले आया। जब कौरव और पांडव बड़े हुए तो उन्हें अपने-अपने हिस्से का राज्य मिल गया। एक दिन शकुनि ने अपने सबसे बड़े भानजे दुर्योधन को पांडवों के साथ चौसर खेलने के लिए उकसाया। शकुनि चौसर का महान खिलाड़ी था और उसके पास जादुई पासे थे जो उसी के इशारों पर चलते।

जब पांडवों और कौरवों के मध्य खेल शुरू हुआ तो शुरुआत में पांडव सभी बाजी जीत गए। लेकिन अंत में वे अपना राजपाट सब हार गए। उन्हें कौरवों द्वारा 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का वनवास दिया गया। फिर पांचों पांडव अपनी पत्नी द्रोपति के साथ वन में जीवन व्यतीत करने लगे।

महाभारत के अनुसार पांडवों का यह वनवास कार्तिक अमावस्या के दिन पूर्ण हुआ था। इस कारण उनके चाहने वालों ने दीपक जलाकर अपनी खुशी प्रकट की। इस तरह से दीपावली को मनाने के पीछे एक कारण और जुड़ गया। तो इस कारण दिवाली मनाई जाती है।

सिक्ख धर्म के अनुसार

दीपावली का दिन सिक्खों के लिए भी एक उत्सव से कम नहीं है। वैसे सिक्ख धर्म के लोग प्रत्येक धर्म से जुड़े हुए हैं। लेकिन हिंदुओं के साथ उनका लगाव ज्यादा है। इस कारण हिंदुओं का प्रत्येक त्यौहार सिक्ख धर्म के लोग मनाते हैं, जिसमें दीपावली भी शामिल है।

सिक्ख इतिहास में इस दिन गुरु गोबिंदसिंह जी, मुगल शासक जहाँगीर की कैद से आजाद हुए थे। इस खुशी में लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। बस इसी दिन से सिक्खों में यह एक उत्सव और त्यौहार की तरफ प्रसिद्ध हो गया।

कहते हैं कि जब जहाँगीर रात को निद्रा अवस्था में थे तो उनके स्वपन में एक फकीर ने आकर गुरु गोबिंदसिंह जी को रिहा करने का आदेश दिया। जिसके बाद जहाँगीर ने बिना देरी किए उन्हें और उनके साथ 52 राजाओं को भी अपनी कैद से रिहा कर दिया था।

इतिहास खँगालने पर पता चलता है कि इस दिन अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर की नींव भी इसी दिन रखी गई थी। स्वर्ण मंदिर सिक्खों का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है। यह उनकी आस्था से जुड़ा एक ऐसा गुरुद्वारा है, जो पिछले 400 वर्षों से हर किसी को मोहित कर रहा है।

तो इस तरह से सिक्ख धर्म के लोग प्रत्येक वर्ष दीपावली का त्यौहार मनाने लगे। हालांकि आज के समय में सभी प्रत्येक धर्म को इज्जत देते हैं। इसलिए मिल-जुलकर त्यौहार बनाते हैं और अपना भाईचारा प्रकट करते हैं।

जैन धर्म में दीपावली

जैन धर्म के लोग भी दीपावली मनाते हैं। इनके दीपावली बनाने के पीछे एक बड़ी घटना छिपी हुई है, जो महावीर स्वामी के जीवन से है। भगवान महावीर का जन्म आज से लगभग 599 ईसा पूर्व (तकरीबन 2500) वर्ष पूर्व हुआ था। ये जैन धर्म के 24वें तीर्थकर थे, या यूं कहें संत थे।

इनका जन्म एक बड़े राजपरिवार में हुआ, लेकिन 30 वर्ष की आयु में इन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया और सन्यासी की राह पर चल पड़े। कहते हैं कि इसके बाद इन्होंने लगातार 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की और उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।

ज्ञानप्राप्ति के बाद भगवान महावीर दुनिया में ज्ञान प्रसारित करने लगे। समय के साथ उनकी आयु बीतने लगी और वो 72 वर्ष की आयु में मोक्ष को प्राप्त हुए। जिस दिन उन्हें मोक्ष की प्राप्त हुई वो कार्तिक अमावस्या थी। इस कारण जैन धर्म के लोग तब से ही दीपक जलाकर भगवान महावीर को याद करते हैं।

जैन लोग भगवान महावीर के जन्मदिन को ‘महावीर जयंती’ और मोक्ष प्राप्ति के दिन को ‘दीपावली’ के रूप में मनाते हैं। इतिहास पढ़ने पर पता चलता है कि इस दिन महावीर स्वामी को छोड़कर किसी को मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ था। इनके साथ हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

महावीर प्रसाद जी ने 5 व्रत सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचार्य के बारे में विस्तार से बताया था। इन पांचों व्रतों को महाव्रत कहा जाता है। कहते हैं कि इंसान अगर इस महाव्रत को रख लें तो उसके जीवन में हमेशा शांति ही शांति रहेगी।

आपकी और दोस्तों:

तो दोस्तों ये था दिवाली क्यों मनाया जाता है, हम उम्मीद करते है की इस पोस्ट को पढ़े के बाद आप सभी को दीपावली मनाने का कारण पता चल गया है|

अगर आपको हमारी ये पोस्ट अच्छी लगी हो तो प्लीज इस पोस्ट को १ लाइक जरुर करे और अपने दोस्तों के साथ जरुर शेयर करे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगो को दिवाली का इतिहास के बारे में पूरी जानकारी मिल पाए|

Click Below To Share

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.